Tuesday, 31 December 2024

new year

सरले किती, उरले किती
आता हिशेब मांडू नका
झाल्या चुका विसरून जा
आपापसांत भांडू नका
सैर मनाला आवर घाला
मर्यादा ओलांडू नका
परतत नाही गेली वेळ
येणारी पण सांडू नका
हवेत इमले बांधून कोणी
सुखी आजवर झाला नाही
वास्तवतेचे ठेवा भान
उशीर अजुनी झाला नाही
कर्तव्याच्या वज्रमुठीला
ठेवा बांधून उघडू नका
पाश्च्यात्यांच्या अनुकरणाने
उगाच आपण बिघडू नका
उसणी कलमे जोडून निर्जीव
लटकी फसवी होतील गावे
संस्कृती आपली महान आहे
तिला जपू या आदरभावे
नववर्षाच्या संकल्पांची
उगाच आपली गर्दी नको
पोकळ आशा घोर निराशा
अपूर्णतेला वर्दी नको
समृद्धीचा येउनी मोहोर
सदा फुलावे आपले जीवन
जाळून अथवा गाडून टाका
दुष्टविचारी आतील रावण
हीच सदीच्छा हेच मागणे
सकाळ आपली व्हावी हसरी
सौख्य राहावे रोज निरंतर
याहून नाही मनीषा दुसरी
               रमेश कुरलीकर


Thursday, 12 December 2024

बाल साहित्य का प्रवास हिंदी

बालसाहित्य की यात्रा और भाषा

      बालसाहित्य बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य है। मराठी बालसाहित्यकी जडे मराठी लोकसाहित्य में पाई गई है, लेकिन इस साहित्य का काल कौनसा है यह बताना मुश्किल है। मराठी साहित्य मराठी लोकसाहित्य का हिस्सा है। बुढी दादी द्वारा सुनाई गई मनोरंजक कहानियाँ, जो संस्कृत से प्राकृत आदि भाषाओ में आई कहानियाँ, महान व्यक्तियों की रोचक कहानियाँ साहित्य को लोकप्रिय बनाती रही, लेकिन लोक साहित्य के अलिखित प्रकृती के कारण मराठी लोकसाहित्य उपलब्ध नही हो सका।
        महानुभाव संप्रदायके लीळाचरित्र जैसे आद्यग्रंथ में बालसाहित्य के कुछ प्रतीक चिहन मिलते है। इसकी कथाएँ दृष्टांत के रूप मे साकार हुई है। इसमें से *महत्वपूर्ण* दृष्टांत लोककथा के स्वरूप में दिखाई देते है। धानाई नाम की एक छोटी बच्ची को उन्होने कुछ कहानियाँ बताई थी जो आज उपलब्ध लोकसाहित्य की सबसे प्राचीन रूप की बालकथा कही जा सकती है।
"साळेचे घर मेणाचे: काऊळेयाचे घर सेणाचे: पावसाळी काऊळेयाचे घर पुढे जाये: साळेचें वाचे: मग उगीची राहिली "
चक्रधर स्वामीजीने ~सौ वर्ष पूर्व~ *बारहवीं सदी में* धानाई को सुनाई हुई कहानियॉ और वर्तमान में छोटे बच्चों को सुनाई जाने वाली चिडिया और कौए की कहानी एक ही है।
  यद्यपि पंचतंत्र पाँचवी शताब्दी में लिखा गया एक संस्कृत ग्रंथ है लेकिन इसका अनुवाद 13 वी और 14 वी शताब्दी में मध्यकालीन मराठी वाङमय की *शुरुआत* है। विष्णू शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र बच्चो से लेकर बडों तक सभी का उद्बोधन करने वाला नीती ग्रंथ ही है। कल्पित कथाओंके माध्यम द्वारा नीती शिक्षा देने का प्रयास पंचतंत्र ने किया है।
    उस समय की शिक्षा प्रणाली में पंचतंत्र, हितोपदेश, इसापनीती आदि ग्रंथों का अंतर्भाव होता था। छोटे छोटे बच्चों से सबसे पहले अमरकोश, शब्दरुपावली मुखोदगत करवायी जाती  थी, बाद में इन्ही ग्रंथो का वाचन करवाया जाता था। बच्चों को अक्सर रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य की कथाएँ सुनाई जाती थी, साथ ही साथ रघुवंश, कुमारसंभव आदी महाकाव्यो जैसे भारतीय संस्कृती के उच्च आदर्श दर्शाने वाली कहानियाँ भी बच्चो को सुनाई जाने लगी। महाकाव्य काल के बाद निर्माण हुई पुराणकथाएँ तो बच्चों के लिए कहानीयों का खजाना ही थी। मंदिर की कथा से उन देवतां की महत्ता का गान करने वाली कथाऐ, पौराणिक कवियों के मुखसे होते हुए जनगंगा तक पहुँची। घर में दादा दादी से लेकर बच्चों तक से यह सुंदर एवं श्राव्यरूप में सुनाई देने लगी।
       लोककथाओं जैसेही लोकगीतों में बच्चों की मनोवृत्ती आकृष्ट करने वाली मनमोहक कविताऐं मिलती है। इससे अंगाई, फुगडी, भोंडला, उखाणा ओवी आदि का जन्म हुआ। बच्चों के गीतों की मुख्य विशेषताएँ इस तरह से पाई जा सकती है और बच्चों के गीत के मुख्य विशेषताएँ है गीतकारिता। सरल भाषा में मजेदार विचार प्रस्तुत करके बच्चों का मनोरंजन इन *गीतों* ने किया है। संसार की अमूल्य निधी होनेवाले बलिराजा के प्रति सजीव प्रेम से लिखे गए यह बाल गीत बच्चों के साथ एकाकारप्रतीत होते है। अलग अलग उत्सवों पर गाए जाने वाले लडकियों के गीत उन्हे आनंद देते है।

*नौंवी सदी* का बालसाहित्य
    यह एहसास बहुत देर से हुआ की मराठी भाषा में बच्चों के लिए साहित्य होना चाहिए। मुद्रण कलाके निर्माण के बाद अंग्रेजी भाषा के अनुकरण से ही बालसाहित्यकी निर्मिती होने लगी। 1806 में तंजावर में सरफोजीराजेने इसापनीती का मराठी में अनुवाद किया और बालबोध मुक्तावली नामक पुस्तक प्रकाशित की। यह मराठी में छपाई की गई पहिली किताब थी। इसके बाद श्रीरामपूर मिशन प्रेस मे डॉ.कॅरी ने वैजनाथ पंडितजी से सिंहासन बत्तीसी, हितोपदेश, पंचतंत्र आदि पुस्तकों का मराठी में अनुवाद करवाया। पंचतंत्र से आई हुई पुस्तकें पंचोपाख्यान और विदुरनीती मराठी में भी प्रकाशित हुई, लेकिन उनका केवल पाठ्यक्रम की पुस्तकों के लिए ही महत्त्व था।
     उस समय बच्चों को नीती पाठ देना यह महत्वपूर्ण उद्देश सामने रखते हुए पुस्तकें लिखी जाती थी। लिपीधारा, अंकलीपी, बोधवचन, पंचोपाख्यान, विदुरनीती आदि पाँच पुस्तकें इसी उद्देश से छपी। इसी समय ही मराठी बालसाहित्य में एक नई पुस्तक जुडी थी वह तीन से आठ वर्ष के बच्चो के लिए लिखी गई पुस्तक बालगोष्टी है। सरल, सुगम एवं बोधगम्य भाषा होने से हैदशाळा पुस्तक मंडलीने इस पुस्तक को तुरंत अपना लिया। इस संस्था के सचिव श्री व्यंकोबा नाईक ने इसापनीती की पुस्तकों का अनुवाद किया और उनकी मृत्यू के बाद यह  कार्य सदाशिव काशिनाथ छत्रे द्वारा पुरा किया गया। बालमित्र और विष्णुशास्त्री बापट लिखित नीती दर्पण सीखने के लिए एक छोटी लेकिन ज्ञानवर्धक पुस्तक है। स. का. छत्रे एक श्रेष्ठ लेखक थे। उन्होंने 1828 में वेताळपंचविशी, बालमित्र, इसापनीती इन तीन ग्रंथों का सरल और आसान अंग्रेजी मे अनुवाद किया। उन्होने 1838 में बोधकथा नामक पुस्तक लिखी।1831 में बालशास्त्री जांभेकर ने बच्चों को शिक्षा के महत्व को समझाने के लिए नीतीकथा पुस्तक लिखी। मेजर कँडी के सुझाव पर 1858 में बोधकथा और नीती बोधकथा नामक पुस्तक प्रकाशित की गई। विष्णुशास्त्री बापटने 1838 में कुल दस कथाओं से पूर्ण नीती दर्पण की रचना की। अतः 1838 में बालोपदेश लिखा गया। शिक्षा मंडल तथा सरकारी शिक्षा विभाग की ओर से हरी केशवजी पठारे ने 1846 में शालोपयोगी नीतिग्रंथ नामक पुस्तक लिखी। 25वीं सदी के दौरान 1825 से 1850 तक मराठी बच्चों के साहित्य में अनुवादित रूप में लिखी गई कीताबें शामिल थी और विशेष रूप से बच्चों के लिए थी।
        वर्ष 1850 में मराठी लेखन के सभी दोष दूर हो गए और बालसाहित्य की स्थिती अच्छी हो गई। शिक्षा बोर्ड ने बच्चों के साहित्य के विकास मे योगदान दिया। 1854-55 में वी.को.ओक जी ने इस विचार की पुष्टी की। 1861-1895 तक शिक्षा विभाग में सहाय्यक शिक्षा निरीक्षक रहे ओक जी ने पाठ्यक्रम की पुस्तकों के सहित बालसाहित्य की लगभग पचास पुस्तकें प्रकाशित की। इसलिए उनको मराठी बाल वांग्मय के जनक कहते थे। इसी काल में हरिकृष्ण दामले ने भी बहुत योगदान दिया। सैंडफोर्ड और मर्टन लिखित हरि और त्र्यंबक का अनुवाद सरल और सुंदर है, जिसे बच्चे समझ सकते हैं और पसंद कर सकते है। इस  काल की सर्वोत्तम पुस्तक अरबी भाषा में सुरसकथाएँ यह है।
इस अनुवादित पुस्तक के कुछ पहले अंश कृष्णशास्त्री चिपळूणकर द्वारा लिखे गए थे। अगले कुछ एपिसोड विष्णुशास्त्री द्वारा लिखे गए थे और आखिर के कुछ हिस्से हरी केशव दामले द्वारा लिखे गए और पुरे *किए* गए थे।
       बच्चों के लिए कविताएँ भी होती है और वो बच्चों को समझती भी है, उन्हें रिझाती भी है यह सत्य अँग्रेजी कविता के अभ्यास से अपने लोगों की समझ में आ गया। इस तरह की पहली कविता महादेव शास्त्री कोल्हटकर ने लिखी थी। उसके बाद *वी. को. ओक,* ह.कृ.दामले, मो.ग. लोढे ने लिखी थी। इसके अलावा बच्चों के दृष्टिकोन की रचना बालगीतों में करने की कोशिश करने वाले कवि दत्त, टिळक, भा.रा.तांबे माधव ज्युलियन, बालकवि, वा.गो.मायदेव ने किया।
    बालनाट्य निर्मितीकी शुरूआत 19 वीं सदी मे शुरू हुई। कहानी और कविता की तुलना में साहित्य की यह विधा उपेक्षित नजर आती है। बच्चों के लिए नाटक लिखना 1828 में शुरू हुआ। बालमित्र पत्रिका में बच्चों के लिए स.का.छत्रे  द्वारा लिखा गया संवाद प्रसिद्ध है- "राजा को देखकर मुझे क्या मिलेगा?" भागीरथी उनके द्वारा लिखित नाटक है। 1829 में किरात ने "पन्हाळगडचा शिलेदार" यह बच्चों के लिए ऐतिहासिक नाटक लिखा।
20 वीं सदी का बाल साहित्य
     20 वीं सदी में बालबुद्धी को पसंद आने वाले बालगीतों को जन्म दिया गया। जिनमें लक्ष्मीबाई तिलक, कवी दत्त, भा.रा.तांबे, माधव ज्युलियन शामिल थे। इसके अलावा काशीताई कानिटकर, ह. स. गोखले, केशवसुत, म.का. कारखानिस, कवी यशवंत, ना.ग. लिमये, वा.गो.मायदेव, भ. श्री. पंडित, वा.ना. विगम, गोपीनाथ तळवळकर, ग.ह.पाटील, साने गुरुजी, के. नारखेडे, व्ही. एम. कुलकर्णी, शांता शेळके, संजीवनी मराठे, लीलावती भागवत, सुमती पायगावकर, अपर्णा देशपांडे, तारा देशपांडे, निर्मला देशपांडे, इंदुमती भावे, सरिता पदकी, नलिनी तळपदे, सरला देवधर, शिरीष पै, वृंदा लिमये, माधुरी पारसनीस, सदानंद रेगे, ग. दि. माडगूळकर, विंदा करंदीकर, राजा मंगळवेढेकर *तथा* आरती प्रभू, मंगेश पाडगावकर जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।  
      मराठी आदमी एक तो राजनीति का दिवाना होता है और दुसरा नाटक का। बालनाट्य, नाट्यछटा, एकांकिका, नाटुकले आदि बच्चों के लिए लिखे गए नाटकों की शैलीयाँ है। 1948  के बाद सई परांजपे, रत्नाकर मतकरी, विजय तेंडुलकर जी का नाटक लेखन समृद्धता से ओतप्रोत दिखाई देता है।
  20 सदी में बाल उपन्यास यह विधा साहित्यिक क्षेत्र में तेजी में थी। जिसमें साने गुरुजी, गंगाधर गाडगीळ, अमरेंद्र गाडगीळ, महादेव शास्त्री जोशी, यदुनाथ थत्ते, मालतीबाई दांडेकर, वामनराव चोरघडे, भालचंद्र रानडे, ना.गो. शुक्ल, गो. नी. दांडेकर, ग. दि. माडगूळकर, भा. रा.भागवत, सुमती पायगावकर, शैलजा राजे, राजा मंगळवेढेकर, शामला शिराळेकर, दि.बा. मोकाशी, दिवाकर बापट, सुधाकर प्रभू, अशोक देशपांडे जी ने बच्चों की दुनिया पर ध्यान केंद्रित करते हुए मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कहाँँनिया लिखी है।
      21वीं सदी में बालसाहित्य का भ्रमण वायुगती से शुरू हो गया। इसमें एकनाथ आव्हाड, संगीता बर्वे, राजीव तांबे, गोविंद गोडबोले, डॉ. श्रीकांत पाटील, कैलास दौंड, सुरेश सावंत, बबन शिंदे, चंद्रकांत निकाडे, परशराम आंबी, नसीम जमादार, शिवाजी चाळक, संजय ऐलवाड जी ने विभिन्न प्रकार के साहित्य के साथ बच्चों का मनोरंजन और ज्ञानवर्धन किया है। बालचरित्र, एकांकिका, नाट्यछटा आदि साहित्यप्रकारो में लेखन हो रहा है और यह एक आशा जनक और आश्वासक बात है।
       बालसाहित्य की भाषा बालसाहित्य की भाषा बच्चों के लिए आनंददायक होनी चाहिए। शुरुआती दिनों में बालसाहित्य की भाषा में आसानी से समझी जाने वाली भाषा पर जोर दिया जाता था। बीसवीं सदी में बालकविता, कथा, उपन्यास और नाटकोनें भाषा का सरल आकलन हो ऐसा प्रयत्न किया है। इसमें मुख्य रूप से बालकविताओंका गायन होता दिखाई देता है। वहीं बालकथा और उपन्यासों के संवाद, नाटक के पात्रों की मुँहबोली भाषा की तरह लिखे गए है जिसमें बच्चों को दिलचस्पी हो। कहानी को रोचक बनाते हुए इस बात का भी ख्याल रखा गया है की भाषा में कोई गडबडी न हो।
     आज 21 वीं सदी के बालसाहित्य की भाषा सरल, सुलभ और बच्चो को जल्द से जल्द अवगत हो ऐसी लिखी गई है। बालकविता में भी नयापन, कथा, उपन्यासों की नाविन्यता, नाटक के नए नए विषय लिखते समय साहित्यको नें भी  यह विषय बच्चों के लिए है इसका ज्ञान और समझ प्रस्तुत करते हुए सरल, सुविधाजनक भाषा में साहित्य लिखा है।